हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार । उषा ने हँस अभिनंदन किया, और पहनाया हीरक-हार ।। जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक । व्योम-तुम पुँज हुआ तब नाश, अखिल संसृति हो उठी अशोक ।। विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत । सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम-संगीत ।। बचाकर बीच रूप से सृष्टि, नाव पर झेल प्रलय का शीत । अरुण-केतन लेकर निज हाथ, वरुण-पथ में हम बढ़े अभीत ।। सुना है वह दधीचि का त्याग, हमारी जातीयता का विकास । पुरंदर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास ।। सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह । दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह ।। धर्म का ले लेकर जो नाम, हुआ करती बलि कर दी बंद । हमीं ने दिया शांति-संदेश, सुखी होते देकर आनंद ।। विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम । भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम । यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म
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