बंद मुट्ठी बच्चे तेरी मुठ्ठी मे क्या है- अरसो पहले किसी ने था ये सवाल परोसा... 'तकदीर' जबाव सिखाया था मास्टर जी ने, तब ना समझ थी नाही उनपे भरोसा... एक जबाब मिला था - शायद पतंग की डोर, कभी ना छूटने की तमन्ना के साथ, या फिर बाबा के जेब से चुराए हुए अट्ठन्नी, दुनिया खरीदने के भरोसे के साथ ... प्रसाद से चुन के निकाले वो लड्डू भी थे, जब समझता था सबसे बड़ी चीज़ है स्वाद, समय भी बाँधा था मुठ्ठी मे, जो कुछ पल मिलते खेलने को स्कूल के बाद ... लाल उस साइकल की हॅंडल भी थी, जब समझा नियंत्रण की शक्ति, रिज़ल्ट वाले एक दिन के लिए, हनुमान जी का लोकेट और ईश्वर की भक्ति... चुराए वो अमरूद, जिसे बाँटते वकत कलेजे से निकला खून दिखता था, वो दस का नोट, जब एक लोहे के गेट के उस पार जिंदगी बिकता था... वो खत भी था लाल स्याह वाला, जिसको चार राते लगी थी लिखने मे, अध-गीली से वो सिगरेट, जलाया था जिसके उल्टा सीखने मे... बड़े मस्शक्कत से खिड़की से ली गई लाल पर्ची जैसी सिनेमा की टिकट
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